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मंत्र उच्चारण शुद्धि कितनी महत्वपूर्ण है जप में?

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शिक्षा वेदांग: 'स्वर/वर्ण दोषयुक्त = वज्र समान हानि।' वैदिक/तांत्रिक = शुद्धि अत्यावश्यक। नाम जप/चालीसा = भाव > उच्चारण। 'मन्त्रहीनं...परिपूर्णं तदस्तु मे' — भक्ति से कमी पूर्ण। गुरु से सीखें + भक्ति = सर्वोत्तम।

  1. 1शिक्षा वेदांग: 'मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह। स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति' — स्वर/वर्ण दोषयुक्त मंत्र अर्थ नहीं देता, वज्र समान हानि करता है।
  2. 2बीज मंत्र में एक अक्षर/स्वर भिन्नता = अर्थ बदले।
  3. 3प्रत्येक ध्वनि = विशिष्ट कंपन (frequency) → गलत कंपन = गलत प्रभाव।
  4. 4'मन्त्रहीनं...भक्तिहीनं...परिपूर्णं तदस्तु मे' — भक्ति से कमी पूर्ण।
  5. 5कन्नप्पा (आंख चढ़ाई), शबरी (जूठे बेर) — भाव > विधि।
  6. 6नाम जप (राम, कृष्ण) में उच्चारण दोष नगण्य — भाव प्रधान।
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