शिव पूजा में आवाहन और विसर्जन का क्या अर्थ है?
की चेकलिस्ट
आवाहन = शिव को पूजा स्थल पर आमंत्रित करना ('आगच्छ भगवान देव')। विसर्जन = पूजा समापन पर विदाई प्रार्थना + क्षमा। स्वयंभू शिवलिंग में शिव नित्य विराजमान — आवाहन/विसर्जन = भक्त का मानसिक समर्पण। षोडशोपचार का प्रथम और अंतिम चरण।
- 1अर्थ: 'आवाहन' = आमंत्रण, बुलाना। भगवान शिव को पूजा स्थल पर आमंत्रित करना।
- 2भाव: 'हे भगवान शिव, कृपया इस शिवलिंग/प्रतिमा में विराजमान हों और मेरी पूजा स्वीकार करें।'
- 3मंत्र: 'आगच्छ भगवान देव! स्थाने चात्र स्थिरो भव। यावत् पूजां करिष्येऽहं तावत् त्वं सन्निधौ भव॥' — 'हे भगवान, यहां पधारें और स्थिर हों। जब तक मैं पूजा करूं, तब तक आप यहीं विराजें।'
- 4क्रिया: हाथ में फूल/अक्षत लेकर शिवलिंग पर अर्पित करना।
- 5अर्थ: 'विसर्जन' = विदाई, प्रस्थान की प्रार्थना। पूजा पूर्ण होने पर शिव से अपने स्थान (कैलाश/सर्वव्यापी) को लौटने की विनम्र प्रार्थना।
- 6भाव: 'हे भगवान, मेरी पूजा पूर्ण हुई। कृपया अपने स्थान को पधारें। मेरी त्रुटियां क्षमा करें।'
- 7विशेष: विसर्जन के पूर्व क्षमा प्रार्थना (अपराध क्षमापन) की जाती है।
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शिव पूजा विधि
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