स्वर्ग और नरक क्या है हिंदू धर्म में
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स्वर्ग = पुण्य कर्मों का फल (दिव्य सुख, इंद्रलोक) — अस्थायी, पुण्य क्षीण होने पर पुनर्जन्म (गीता 9.21)। नरक = पाप कर्मों का दंड (यातनाएं) — अस्थायी। दोनों मोक्ष नहीं हैं। मोक्ष (जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्ति) ही परम लक्ष्य।
- 1स्थान — पुराणों में स्वर्ग को भूलोक से ऊपर, मेरु पर्वत पर वर्णित किया गया है। इंद्र इसके राजा हैं।
- 2कैसे मिलता है — यज्ञ, दान, तप, सत्कर्म, धर्माचरण से। गीता 9.20 — वेद अध्ययन और यज्ञ करने वाले स्वर्ग प्राप्त करते हैं।
- 3स्वर्ग की विशेषता — दिव्य सुख, अप्सराएं, कल्पवृक्ष, अमृत, देवताओं का संग। कोई रोग, वृद्धावस्था, दुःख नहीं।
- 4अस्थायी — गीता 9.21 — 'ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' — स्वर्ग का सुख भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में लौटते हैं।
- 514 लोक — भूलोक के ऊपर 6 लोक (भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक, सत्यलोक/ब्रह्मलोक) — इनमें स्वर्लोक ही सामान्यतः 'स्वर्ग' कहलाता है।
- 6स्थान — भूलोक के नीचे 7 पाताल लोकों से भी नीचे।
- 7कैसे मिलता है — पाप कर्म, हिंसा, झूठ, चोरी, अधर्म, क्रूरता।
- 8नरक की विशेषता — विभिन्न प्रकार की यातनाएं, कर्मानुसार दंड। गरुड़ पुराण में 28 प्रमुख नरकों का वर्णन है (विस्तार प्रश्न 187 में)।
- 9अस्थायी — नरक भी शाश्वत नहीं। पाप भोगने के बाद जीव पुनः जन्म लेता है।
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