तंत्र साधना में श्मशान भस्म का प्रयोग कैसे होता है?
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श्मशान भस्म: शिव = भस्मधारी (वैराग्य प्रतीक)। उन्नत तांत्रिक साधना (अघोर/कापालिक) में। आध्यात्मिक: मृत्यु भय विजय। गुरु दीक्षा अनिवार्य — बिना अधिकार अत्यंत खतरनाक। सामान्य भक्त: यज्ञ भस्म/विभूति/गोमय भस्म = पर्याप्त।
- 1शिव और भस्म: शिव पुराण में शिव को 'भस्मधारी' कहा गया है। भस्म = वैराग्य का प्रतीक — सब कुछ अंततः भस्म होता है। शिव भस्म लगाकर संसार की नश्वरता का स्मरण कराते हैं।
- 2तांत्रिक प्रयोग: उन्नत तांत्रिक साधनाओं (विशेषतः वामाचार/अघोर परम्परा) में श्मशान भस्म का प्रयोग शरीर पर लेपन, मंत्र अभिमंत्रण, और विशेष अनुष्ठानों में होता है। यह भय निवारण, मृत्यु भय पर विजय, और परम वैराग्य की साधना से जुड़ा है।
- 3आध्यात्मिक अर्थ: श्मशान भस्म = मृत्यु बोध। जो साधक मृत्यु से भयमुक्त हो जाता है, वह सर्वोच्च साधक है। 'मरण भय से मुक्ति = जीवन का पूर्ण आनन्द।'
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