देवी सूक्त मंत्र - 8
अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा। परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सम्बभूव॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
सम्पूर्ण लोकों का निर्माण करती हुई मैं वायु के समान स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होती हूँ। मैं अपनी महिमा से द्युलोक और इस पृथ्वी के भी परे अनंत विस्तार वाली हूँ 1।
इस मंत्र से क्या होगा?
परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति
विस्तृत लाभ
परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः। राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः॥ दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः। हनुमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः॥
ॐ भक्तार्तिभञ्जनाय नमः
रक्तो रक्ताङ्गरागां शुक कुसुमायुत तुन्दिलश्चन्द्रमौलिः नेत्रैर्युक्तस्त्रिभिर्वामनकरचरणो बीजपूरं दधानः । हस्ताग्रक्लृप्त पाशाङ्कुश शरवरदो नागवक्त्रो हि भूषो देवः पद्मासनस्थो भवतु सुखकरो भूतये विघ्नराजः ॥
ॐ सरस्वत्यै नमः
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
ॐ गोविन्दाय नमः