कालभैरवाष्टकम् - मंत्र 3
शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
हाथों में त्रिशूल, पाश और दंड धारण करने वाले निरोगी आदिदेव की वंदना करता हूँ।
इस मंत्र से क्या होगा?
रोगों से मुक्ति (निरामयम्) और अस्त्र-शस्त्रों के भय का नाश
विस्तृत लाभ
रोगों से मुक्ति (निरामयम्) और अस्त्र-शस्त्रों के भय का नाश।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ओष्ठं सदाऽवतु। (स्वरूप: विद्याधिष्ठात्री | लाभ: होठों और उच्चारण स्थान की रक्षा | अर्थ: विद्या की अधिष्ठात्री देवी मेरे होंठों की सदा रक्षा करें) 8
रक्तो रक्ताङ्गरागां शुक कुसुमायुत तुन्दिलश्चन्द्रमौलिः नेत्रैर्युक्तस्त्रिभिर्वामनकरचरणो बीजपूरं दधानः । हस्ताग्रक्लृप्त पाशाङ्कुश शरवरदो नागवक्त्रो हि भूषो देवः पद्मासनस्थो भवतु सुखकरो भूतये विघ्नराजः ॥
ॐ जरामरणवर्जिताय नमः
ॐ गुहप्रीताय नमः
ॐ सीताशोकनिवारणाय नमः
ॐ विभवे नमः