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शास्त्रीय पौराणिक मंत्र

गौतमीय तंत्र युगल ध्यान मंत्र

दिव्याद्वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः श्रीमद्रत्नागारसिंहासनस्थौ। श्रीश्रीराधाश्रीलगोविन्ददेवौ प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि॥

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारध्यान मंत्र
स्वरूपश्री राधा-गोविन्द (सिंहासनस्थ)
अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का अर्थ

मैं अलौकिक वृंदावन के कल्पवृक्ष के नीचे, रत्नों के भव्य सिंहासन पर विराजमान, अपनी प्रिय सखियों (गोपियों) द्वारा सेवित श्री राधा और गोविन्द देव का स्मरण करता हूँ।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

ध्यान की असीम गहराई, चंचल मन की एकाग्रता और निकुंज दर्शन की योग्यता

विस्तृत लाभ

ध्यान की असीम गहराई, चंचल मन की एकाग्रता और निकुंज दर्शन की योग्यता 31।

जप काल

मानसी सेवा, अष्टकालीय लीला स्मरण और रूप-ध्यान के समय।

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