गुह्यकाली शतक्षरा मंत्र
ख्फ्रेँ ख्फ्रीँ चण्डे चण्डचामुण्डे ह्रीँ हूँ स्त्रीँ छ्रीँ विच्चे घोरे महामदोन्मनि क्लीँ ब्लूँ गुह्येश्वरि ॐ परानिर्वाणे ब्रह्मरूपिणि ॐ फ्रेँ फ्रेँ सिद्धिकरालि आप्यायिनि नवपञ्चचक्रनिलये घोराट्टराविणि कलासहस्रनिवासिनि खँ खँ खँ ह्सौँ फ्रेँ अवर्णेश्वरि प्रकृत्यपर शिवनिर्वाणदे ख्फ्रेँ स्वाहा॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
हे चण्ड-मुण्ड विनाशिनी, गुह्येश्वरी, ब्रह्मरूपिणी, चक्रों की निवासिनी गुह्यकाली, मुझे निर्वाण और पूर्ण सिद्धियां प्रदान करें।
इस मंत्र से क्या होगा?
कलाओं में निपुणता और परा-निर्वाण की प्राप्ति
विस्तृत लाभ
कलाओं में निपुणता और परा-निर्वाण की प्राप्ति।
जप काल
केवल गुह्यकाली दीक्षा प्राप्त साधकों हेतु।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट स्वर्वाहिनी विमलचारुजलप्लुताङ्गीम्। प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम्॥
ऐं क्लीं सौः श्रीं ह्रीं कामेश्वर ह्रीं श्रीं सौः क्लीं ऐं।
द्विषड्भुजं द्वादशदिव्यनेत्रं त्रयीतनुं शूलमसिं दधानम् । शेषावतारं कमनीयरूपं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये ॥
ॐ महाप्रभवे नमः
ॐ मान्याय नमः
ॐ आदिशक्त्यै नमः