शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
कालभैरवाष्टकम् - मंत्र 4
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारस्तोत्र-मंत्र
स्वरूपकाल भैरव
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाले भक्तवत्सल भैरव का ध्यान करता हूँ।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
भौतिक भोग और आध्यात्मिक मोक्ष दोनों की एक साथ प्राप्ति
विस्तृत लाभ
भौतिक भोग और आध्यात्मिक मोक्ष दोनों की एक साथ प्राप्ति।
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भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम्। गतगर्वप्रियं शूरं जमदग्निसुतुं मतम्॥
अभयवरदहस्तः पाशदन्ताक्षमाला सृणिपरशुदधानो मुद्गरं मोदकं च । फलमधिगत सिंहः पञ्चमातङ्गवक्त्रो गणपतिरतिगौरः पातु हेरम्बनामः ॥
नमो नमस्तुभ्यम् असह्यवेग-शक्तित्रयायाखिल-धीगुणाय
भजे विशेषासुन्दरं समस्तपापखण्डनम्...
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः। अवलोकय मामकिञ्चनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः॥
ॐ सत्त्वगुणाश्रयायै नमः