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शास्त्रीय पौराणिक मंत्र

देवी सूक्त मंत्र - 6

अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ। अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश॥

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारवैदिक मंत्र |
स्वरूपसंहारक एवं पालक शक्ति
अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का अर्थ

ब्रह्मद्वेषी (सत्य के विरोधी) राक्षसों का वध करने के लिए मैं ही भगवान रुद्र के धनुष पर डोरी चढ़ाती हूँ। मैं ही सज्जनों के लिए शत्रुओं से युद्ध करती हूँ और मैं ही द्यावा-पृथ्वी में व्याप्त हूँ 1।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

दुष्टों का नाश और संघर्षों में विजय

विस्तृत लाभ

दुष्टों का नाश और संघर्षों में विजय।

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