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शास्त्रीय पौराणिक मंत्र

देवी सूक्त मंत्र - 7

अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे। ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि॥

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारवैदिक मंत्र |
स्वरूपविश्व-योनि (Cosmic Womb)
अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का अर्थ

इस विश्व के शिखर (द्युलोक) पर मैं ही पिता (आकाश) को उत्पन्न करती हूँ। मेरा उद्गम समुद्र (ब्रह्म चैतन्य) के भीतर है। वहां से मैं सभी लोकों में व्याप्त होकर अपने शिखर से आकाश को स्पर्श करती हूँ 1।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

सृष्टि के रहस्यों का ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार

विस्तृत लाभ

सृष्टि के रहस्यों का ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार।

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