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शास्त्रीय पौराणिक मंत्र

कार्य सिद्धि एवं नेतृत्व क्षमता हेतु मंत्र (वाल्मीकि रामायण)

यस्य त्वेतानि चत्वारि वानरेन्द्र यथा तव। धृतिर्दृष्टिर्मतिर्दाक्ष्यं स कर्मसु न सीदति॥

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारश्लोक-मंत्र / सफलता मंत्र
स्वरूपनेतृत्वकर्ता राम
अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का अर्थ

हे वानरश्रेष्ठ (हनुमान)! जिसके पास तुम्हारे समान ये चार गुण—धैर्य, दूरदृष्टि, बुद्धि और दक्षता—हैं, वह कभी अपने कार्यों में असफल या दुखी नहीं होता।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

दृढ़ता, स्पष्ट दृष्टि, बुद्धिमत्ता और कर्म-कौशल की प्राप्ति

02

इसे जपने से व्यक्ति किसी भी कार्य में असफल नहीं होता

विस्तृत लाभ

दृढ़ता, स्पष्ट दृष्टि, बुद्धिमत्ता और कर्म-कौशल की प्राप्ति। इसे जपने से व्यक्ति किसी भी कार्य में असफल नहीं होता 30।

जप काल

नवीन कार्य प्रारंभ करते समय मानसिक स्मरण।

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