शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
वासुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥
वासुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारकृष्णाष्टकम् ध्यान मन्त्र / स्तोत्र-मन्त्र
स्वरूपजगद्गुरु श्रीकृष्ण (महाभारत स्वरूप)
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
वासुदेव के पुत्र, कंस और चाणूर जैसे असुरों का वध करने वाले, माता देवकी को परमानन्द देने वाले, जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ 35।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
विद्या, ज्ञान, गुरु-कृपा की प्राप्ति और अज्ञान रूपी राक्षसों (कंस-चाणूर रूपी दुर्गुणों) का नाश
विस्तृत लाभ
विद्या, ज्ञान, गुरु-कृपा की प्राप्ति और अज्ञान रूपी राक्षसों (कंस-चाणूर रूपी दुर्गुणों) का नाश 35।
जप काल
भगवद्गीता-पाठ या शास्त्रों के अध्ययन से पूर्व मंगलाचरण के रूप में।
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