आ नो दिवो बृहतः
आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम्। हवं देवी जुजुषाणा घृताची शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
महान द्युलोक और पर्वत से पूजनीय सरस्वती हमारे इस यज्ञ में पधारें। हमारे आह्वान का प्रसन्नतापूर्वक सेवन करती हुई वे देवी हमारी कल्याणकारी स्तुति को सुनें।
इस मंत्र से क्या होगा?
मनोवांछित फल की प्राप्ति, अनुष्ठान में देवी का प्रत्यक्ष सान्निध्य
विस्तृत लाभ
मनोवांछित फल की प्राप्ति, अनुष्ठान में देवी का प्रत्यक्ष सान्निध्य।
जप काल
सरस्वती अनुष्ठान में अभिषेक एवं न्यास के समय।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ कराल-वदनां घोरां मुक्त-केशीं चतुर्भुजाम्। कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्ड-माला विभूषिताम्। सद्यः-छिन्न-शिरः-खड्ग-वामाधोर्ध्व-कराम्बुजाम्। अभयं वरदञ्चैव दक्षिणोर्ध्वाधः-पाणिकाम्॥
ॐ यो वै रामचन्द्रः स भगवान् ये ब्रह्मानन्दामृतं तस्मै वै नमो नमः भूर्भुवः स्वः
ॐ तुष्ट्यै नमः
ॐ पञ्चवक्त्राय नमः
ॐ रक्तश्यामगळाय नमः
ॐ मैत्र्यै नमः