शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः (अगस्त्य रचित)
दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः स्फटिकमणिनिभैरक्षमालान्दधाना। हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण॥ भासा कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकमणिनिभा भासमानाऽसमाना। सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारध्यान मन्त्र
स्वरूपवाग्देवता (चतुर्भुजा)
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
जो चार भुजाओं से युक्त हैं, स्फटिक की माला, श्वेत कमल, तोता और पुस्तक धारण करती हैं, वे सुप्रसन्न वाग्देवता मेरे मुख में सदा निवास करें।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
वदन (मुख) पर सदा वाग्देवी की प्रसन्नता का वास
विस्तृत लाभ
वदन (मुख) पर सदा वाग्देवी की प्रसन्नता का वास।
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