माँ सरस्वती मंत्र
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्। सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
जो मनुष्य पवित्र होकर घी से आहुति देता है और श्री की कामना से इन पंद्रह ऋचाओं का जप करता है, वह समृद्ध होता है।
इस मंत्र से क्या होगा?
अनुष्ठान की पूर्णता
विस्तृत लाभ
अनुष्ठान की पूर्णता।
जप काल
साधना के अंत में।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
वीणां कल्पलतां अरिं च वरदं दक्षे विदत्ते करैः वामे तामरसं च रत्नकलशं सन्मञ्जरीं चाभयम् । शुण्डादण्ड लसन्मृगेन्द्रवदनः शङ्खेन्दुगौरः शुभो दीव्यद्रत्ननिभांशुकः गणपतिः पायादपायात्स नः ॥
ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्म्यै स्वाहेति दन्तपङ्क्तीः सदाऽवतु। (स्वरूप: ब्राह्मी | लाभ: दाँतों और स्पष्ट वाचन-स्थान की रक्षा | अर्थ: ब्राह्मी देवी मेरी दंत-पंक्तियों की सदा रक्षा करें) 8
ॐ भैरवीनाथाय नमः।
ॐ तारकासुरसंहारिणे नमः
ॐ क्रव्यादोपनिबर्हिण्यै नमः
ॐ भगवते नमः