देवी सूक्त मंत्र - 6
अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ। अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
ब्रह्मद्वेषी (सत्य के विरोधी) राक्षसों का वध करने के लिए मैं ही भगवान रुद्र के धनुष पर डोरी चढ़ाती हूँ। मैं ही सज्जनों के लिए शत्रुओं से युद्ध करती हूँ और मैं ही द्यावा-पृथ्वी में व्याप्त हूँ 1।
इस मंत्र से क्या होगा?
दुष्टों का नाश और संघर्षों में विजय
विस्तृत लाभ
दुष्टों का नाश और संघर्षों में विजय।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं ह्स्सौः हूँ फट् नील सरस्वत्यै स्वाहा।
ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा। अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्ष्रौम्॥
ॐ स्ह्क्ल्रीं हं नमः।
ॐ सर्वमन्त्रस्वरूपवते नमः
ॐ कराल-वदनां घोरां मुक्त-केशीं चतुर्भुजाम्। कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्ड-माला विभूषिताम्। सद्यः-छिन्न-शिरः-खड्ग-वामाधोर्ध्व-कराम्बुजाम्। अभयं वरदञ्चैव दक्षिणोर्ध्वाधः-पाणिकाम्॥
ॐ सुरसैन्यसुरक्षकाय नमः