शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
देवी सूक्त मंत्र - 1
ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः। अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारवैदिक मंत्र (ऋग्वेद) |
स्वरूपवाक् (परब्रह्म स्वरूपा)
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
मैं ही रुद्रों, वसुओं, आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में विचरण करती हूँ। मैं ही मित्रा-वरुण, इंद्र-अग्नि और दोनों अश्विनीकुमारों को धारण करती हूँ 1।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ाव और सर्वव्यापकता का बोध
विस्तृत लाभ
ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ाव और सर्वव्यापकता का बोध 1।
जप काल
सस्वर वैदिक पाठ।
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