शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
वात-रोग एवं बाहु-पीड़ा नाशक मंत्र (हनुमान बाहुक)
सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु। भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारशारीरिक पीड़ा निवारक मंत्र (छप्पय छंद)
स्वरूपकराल-मूर्ति (विशाल रूप)
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
समुद्र को लांघने वाले, सीता जी का शोक हरने वाले, बाल-सूर्य के समान लाल देह वाले, विशाल भुजाओं और भयानक मूर्ति वाले, जो स्वयं काल के भी काल हैं (उन हनुमान जी को नमन)।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
वात रोग (Arthritis), बाहु-पीड़ा (Arm/Shoulder pain) और शारीरिक अंगों के भयंकर कष्टों का निवारण
02
(तुलसीदास जी ने अपनी बाहु-पीड़ा शमन हेतु इसकी रचना की थी)
विस्तृत लाभ
वात रोग (Arthritis), बाहु-पीड़ा (Arm/Shoulder pain) और शारीरिक अंगों के भयंकर कष्टों का निवारण। (तुलसीदास जी ने अपनी बाहु-पीड़ा शमन हेतु इसकी रचना की थी) 17।
जप काल
जल का पात्र सामने रखकर 40 दिन तक नित्य प्रातः काल पाठ 17।
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