कुमार सूक्त मंत्र 2
अयं यः सृञ्जये पुरो दैववाते समिध्यते । द्युमाँ अमित्रदम्भनः ॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
देववात के पुत्र सृञ्जय के लिए प्रज्वलित यह अग्नि दीप्तिमान और शत्रुओं का नाश करने वाली है।
इस मंत्र से क्या होगा?
विरोधियों का शमन, यश व कीर्ति की प्राप्ति
विस्तृत लाभ
विरोधियों का शमन, यश व कीर्ति की प्राप्ति।
जप काल
वैदिक आहुति के साथ।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ हिरण्यकशिपुध्वंसिने नमः
ॐ कामाक्ष्यै नमः
ॐ महाश्रयायै नमः
ॐ हनुमान पहलवान पहलवान, बरस बारह का जबान, हाथ में लड्डू मुख में पान, खेल खेल गढ़ लंका के चौगान, अंजनी का पूत, राम का दूत, छिन में कीलौ नौ खंड का भूत, जाग जाग हड़मान हुँकाला, ताती लोहा लंकाला, शीश जटा डग डेरू उमर गाजे, वज्र की कोठड़ी ब्रज का ताला, आगे अर्जुन पीछे भीम, चोर नार चंपे ने सींण, अजरा झरे भरया भरे, ई घट पिंड की रक्षा राजा रामचंद्र जी लक्ष्मण कुँवर हड़मान करें।
ॐ अखिलेश्वर्यै नमः
ॐ क्रीं कालिकायै नमः॥