ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
चेकलिस्ट

अद्वैत वेदांत के अनुसार आत्मा और ब्रह्म एक कैसे?

की चेकलिस्ट

शंकराचार्य: 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।' आत्मा ब्रह्म ही है — अज्ञान (माया) के कारण भेद दिखता है। घड़े का आकाश = महाआकाश, लहर = समुद्र। चारों महावाक्य यही कहते हैं। अज्ञान हटना ही मोक्ष है।

  1. 1अज्ञान (अविद्या) का आवरण: जीवात्मा वास्तव में ब्रह्म ही है, परंतु अज्ञान (अविद्या/माया) के कारण उसे अपनी सीमितता का भ्रम होता है। जैसे रस्सी में साँप का भ्रम — साँप कभी था ही नहीं, केवल भ्रम था।
  2. 2उपाधि भेद: जैसे एक ही आकाश को घड़े में बंद करने पर 'घटाकाश' कहते हैं, पर घड़ा टूटने पर वह महाकाश में विलीन हो जाता है — वैसे ही शरीर (उपाधि) के कारण आत्मा सीमित दिखती है, पर वास्तव में वह असीम ब्रह्म ही है।
  3. 3महावाक्य प्रमाण:
  4. 4दृष्टांत: जैसे समुद्र की लहर समुद्र से भिन्न दिखती है पर है जल ही — वैसे ही जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न दिखती है पर है ब्रह्म ही।
सम्पूर्ण उत्तर
विस्तृत प्रश्न पृष्ठ देखें

मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।

श्रेणी
दर्शन

इस श्रेणी के अन्य प्रश्नोत्तर।