बाणलिंग: नर्मदा नदी से प्राप्त, प्रवाह से गोलाकार, बाणासुर कथा से नामकरण, घर में स्थापना सरल। स्वयंभू: शिव स्वयं प्रकट, अत्यंत दुर्लभ, अमरनाथ/ज्योतिर्लिंग इसी श्रेणी में। दोनों में प्राण प्रतिष्ठा अनावश्यक। स्वयंभू सर्वश्रेष्ठ, बाणलिंग सर्वसुलभ।
- 1उत्पत्ति: नर्मदा नदी के तल में प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। नदी के प्रवाह से घिसकर गोलाकार/अंडाकार बनते हैं।
- 2नाम का कारण: पौराणिक कथा के अनुसार बाणासुर ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को अमरकंटक पर्वत पर लिंग रूप में विराजित किया। ये शिवलिंग नर्मदा में बहकर आए, अतः 'बाणलिंग' कहलाए।
- 3वरदान: शिव पुराण और नर्मदा पुराण के अनुसार भगवान शिव ने नर्मदा को वरदान दिया कि उसके तट का प्रत्येक कंकड़-पत्थर शिवलिंग रूप में पूजित होगा।
- 4प्राण प्रतिष्ठा: आवश्यक नहीं — स्वतः सिद्ध माना गया है।
- 5विशेषता: घर में स्थापना सरल। हजारों मिट्टी के शिवलिंगों की पूजा का फल दर्शन मात्र से।
- 6पीठ/जलधारी नियम: शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) के अनुसार बाणलिंग के लिए लिंग और पीठ का एक ही उपादान होना अनिवार्य नहीं — यह अपवाद है।
- 7उत्पत्ति: भगवान शिव किसी कारणवश स्वयं शिवलिंग के रूप में पृथ्वी पर प्रकट होते हैं। यह किसी मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं होता।
- 8स्थान: प्राकृतिक रूप से पर्वतों, गुफाओं, नदी तटों, भूमि से प्रकट होते हैं।
- 9उदाहरण: अमरनाथ (हिमलिंग), केदारनाथ, विश्वनाथ (काशी), 12 ज्योतिर्लिंग (जो स्वयं प्रकट ज्योति स्तंभ हैं)।
- 10प्राण प्रतिष्ठा: आवश्यक नहीं — शिव स्वयं विराजमान हैं।
- 11विशेषता: अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली। मंदिर इन्हीं के चारों ओर बनाए जाते हैं।
- 12महत्व: स्वयंभू शिवलिंग की पूजा सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक फलदायी मानी गई है।