कुलार्णव: शुद्ध स्थान, शुद्ध समय, शुद्ध वेश, शुद्ध मन — चारों शुद्धि से सिद्धि। नियम: स्नान, सात्विक आहार, मौन, ब्रह्मचर्य, नित्य निश्चित संख्या, जप बीच में न छोड़ें, मंत्र गोप्य रखें। माला जमीन पर न रखें।
- 1शुद्ध स्थान, शुद्ध समय, शुद्ध वेश, और शुद्ध मन — इन चारों की शुद्धि से ही मंत्र-सिद्धि होती है।
- 2जप से पूर्व स्नान अनिवार्य। यदि स्नान संभव न हो — आचमन (जल से तीन बार हाथ-मुख स्पर्श) करें।
- 3जप काल में शुद्ध वस्त्र (धुले हुए)।
- 4मासिक-धर्म काल में स्त्रियों के लिए कुछ तांत्रिक परंपराओं में जप-विराम — परंतु यह सभी परंपराओं में नहीं। गुरु से पूछें।
- 5साधना काल में सात्विक आहार — तामसिक (मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन) और राजसिक (अधिक तीखा, मसालेदार) आहार वर्जित।
- 6एकाहार (एक बार भोजन) या मिताहार (कम खाना) साधना को बल देता है।
- 7जप काल में मौन (वाचिक और मानसिक कलह दोनों से दूरी)।
- 8असत्य, निंदा, क्रोध, और काम-विचार — साधना के शत्रु।
- 9ब्रह्मचर्य — कम से कम साधना-काल में।
- 10प्रतिदिन एक निश्चित समय, निश्चित स्थान, निश्चित संख्या — यह 'नित्यता' सबसे महत्वपूर्ण।
- 11जप बीच में न छोड़ें — यदि बाधा आए तो माला रख दें, बाद में पूर्ण करें।
- 12एक माला जप में जम्हाई, छींक, थूकना — दोष माना गया है। दोष के बाद तीन अतिरिक्त जप करें।
- 13माला को जमीन पर न रखें।
- 14माला का उपयोग केवल जप में — पहनने या दिखाने के लिए नहीं।
- 15सोते समय माला उतार दें या थैली में रखें।