बुरे कर्म करने वाले सुखी क्यों रहते हैं, उत्तर क्या?
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बुरे कर्मी का सुख पूर्व जन्मों के पुण्य भंडार का फल है — यह अस्थायी है। बुरे कर्मों का फल विलंब से पर अवश्य आता है (कौरवों की तरह)। बाहरी सुख भीतरी शांति नहीं है। अंतिम न्याय अटल है।
- 1बुरे कर्म करने वाले का वर्तमान सुख पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों का फल है। जब तक पुराना पुण्य भंडार शेष है, सुख मिलता रहता है।
- 2जैसे बैंक में पुरानी जमा राशि — बुरे कर्मों से वह घटती जा रही है, पर जब तक है तब तक खर्च हो रही है।
- 3बुरे कर्मों का फल तुरंत नहीं आता — *'पापी की पनपता देखि मत ललचाइए जो'*
- 4समय आने पर अवश्य भोगना पड़ता है — महाभारत में कौरवों का उदाहरण।
- 5वर्तमान जीवन का प्रारब्ध शुभ है (पूर्व पुण्य से), पर वर्तमान के बुरे कर्म (क्रियमाण) भविष्य/अगले जन्म में दुख लाएँगे।
- 6विदुर नीति में कहा गया — *'धर्म की डगर पर चलने में विलंब भले हो, पर सत्य और न्याय की विजय अवश्य होती है।'*
- 7पुराणों में भी स्पष्ट है — पापी का सुख अस्थायी है, अंत में नरक या निम्न योनियों में जन्म मिलता है।
- 8बाहर से जो सुखी दिखते हैं, भीतर से अशांत, भयभीत और असंतुष्ट हो सकते हैं। सच्चा सुख (आनंद) केवल धर्म से प्राप्त होता है।
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