ध्यान करने से कर्म कैसे शुद्ध होते हैं?
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ध्यान से कर्म-शुद्धि: गीता (4.37): ज्ञानाग्नि सभी कर्म भस्म करती है। चार स्तर: क्रियमाण (सात्विक बनना), आगामी (अबंधनकारी), संचित (संस्कार नष्ट), प्रारब्ध (शीघ्र क्षय)। योगसूत्र: समाधि-भावना → क्लेश-तनुकरण → कर्म-क्षय।
- 1क्रियमाण कर्म — ध्यान से वर्तमान में कर्म सात्विक बनते हैं
- 2आगामी कर्म — शुद्ध मन से किए कर्म बंधनकारी नहीं
- 3संचित कर्म — गहरे ध्यान में संस्कार उठते हैं, प्रकाशित होकर नष्ट होते हैं
- 4प्रारब्ध — ध्यान से भोगने की शक्ति बढ़ती है, कर्म-फल शीघ्र क्षय
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