विस्तृत उत्तर
ध्यान से कर्म-शुद्धि का वर्णन भागवत, गीता और योगसूत्र में विस्तार से मिलता है।
शास्त्रीय प्रमाण
भागवत पुराण (11.14.19): 'ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।' — ध्यान से आत्मा को देखने पर कर्म-बंधन शिथिल होते हैं।
भगवद्गीता (4.37): 'यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।' — जैसे अग्नि ईंधन को जलाती है, वैसे ज्ञानाग्नि सभी कर्मों को भस्म करती है। ध्यान = ज्ञानाग्नि का उद्गम।
कर्म शुद्धि की प्रक्रिया
- 1क्रियमाण कर्म — ध्यान से वर्तमान में कर्म सात्विक बनते हैं
- 2आगामी कर्म — शुद्ध मन से किए कर्म बंधनकारी नहीं
- 3संचित कर्म — गहरे ध्यान में संस्कार उठते हैं, प्रकाशित होकर नष्ट होते हैं
- 4प्रारब्ध — ध्यान से भोगने की शक्ति बढ़ती है, कर्म-फल शीघ्र क्षय
योगसूत्र (2.2): समाधि-भावना = क्लेश-तनुकरण = कर्म-क्षय।





