गीता 11: अर्जुन ने कृष्ण का विश्वरूप देखा — समस्त सृष्टि, काल, देवता एक शरीर में। कृष्ण: 'कालोऽस्मि' (11.32)। महत्व: ईश्वर सर्वव्यापी प्रमाणित, अर्जुन का संदेह/अहंकार मिटा, दिव्य दृष्टि = ईश्वर कृपा। अंत में सगुण रूप = भक्ति सरल।
- 1ईश्वर सर्वव्यापी — भगवान कण-कण में हैं — कृष्ण ने शब्दों से नहीं, प्रत्यक्ष दर्शन से सिद्ध किया।
- 2अर्जुन का संदेह मिटा — 'कृष्ण मेरे मित्र/सारथी हैं' — यह भ्रम टूटा। वे साक्षात् परब्रह्म हैं।
- 3भय + भक्ति — अर्जुन ने भय और विस्मय अनुभव किया। फिर कहा (11.40) — 'नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते' — आगे से, पीछे से, सब ओर से नमस्कार। यह भक्ति का चरम है।
- 4विनम्रता — अर्जुन ने क्षमा मांगी (11.41-42) — 'हे कृष्ण, मैंने सखा समझकर तुम्हें हे कृष्ण, हे यादव कहा — क्षमा करो।'
- 5सगुण रूप की प्राथमिकता (11.46-51):
- 6दिव्य दृष्टि आवश्यक (11.8):