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गीता के 15वें अध्याय — पुरुषोत्तम योग क्या है?

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अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग — 20 श्लोक): संसार = उल्टा अश्वत्थ वृक्ष। जीवात्मा ईश्वर का अंश (15.7)। तीन पुरुष: क्षर (नाशवान), अक्षर (अविनाशी), पुरुषोत्तम (सर्वोच्च परमात्मा)। 'इसे जानने वाला सर्वज्ञ' (15.19-20)। गीता का सबसे गोपनीय अध्याय।

  1. 1संसार को एक उल्टे पीपल के वृक्ष (अश्वत्थ) से उपमा दी गई — जिसकी जड़ें ऊपर (ब्रह्म में) और शाखाएँ नीचे (संसार में) हैं।
  2. 2इस वृक्ष को वैराग्य रूपी शस्त्र से काटकर उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ से लौटना नहीं होता।
  3. 3जीवात्मा ईश्वर का सनातन अंश है (15.7): *'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः'*
  4. 4आत्मा शरीर से शरीर में जाते समय मन और इंद्रियों को साथ ले जाती है — जैसे वायु सुगंध को (15.8)।
  5. 5क्षर पुरुष — संसार के सभी नाशवान प्राणी।
  6. 6अक्षर पुरुष — अविनाशी आत्मा/माया।
  7. 7पुरुषोत्तम — क्षर और अक्षर दोनों से परे, सर्वोच्च परमात्मा। *'यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः, अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः'* (15.18)
  8. 8जो मुझे (कृष्ण को) पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ है और सम्पूर्ण भाव से मेरा भजन करता है (15.19)।
  9. 915.20: यह सबसे गोपनीय शास्त्र है — इसे जानने वाला बुद्धिमान और कृतार्थ हो जाता है।
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