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होली पर रंग खेलने का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

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रंग अर्थ: कृष्ण-गोपी लीला, समानता (सब एक=अद्वैत), जीवन रंग (अनुभव स्वीकार), बुराई बाद अच्छाई उत्सव, वसंत-प्रकृति एकत्व, क्षमा+नवीनता ('बुरा न मानो')। प्राकृतिक रंग (टेसू/हल्दी) प्रयोग।

  1. 1कृष्ण लीला: भागवत: कृष्ण ने गोपियों के साथ ब्रज में रंग-गुलाल खेला। 'होरी खेलत नंदलाल, बरसाने में' — यह कृष्ण की दिव्य लीला का पुनराभिनय।
  2. 2समानता (Equality): रंग लगने पर सब एक जैसे दिखते हैं — राजा-रंक, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है। होली = 'सब एक हैं' = अद्वैत = ब्रह्म में सब समान।
  3. 3जीवन रंग: जीवन = विभिन्न रंगों (अनुभवों) का संगम — सुख (लाल), शांति (हरा), ज्ञान (पीला), भक्ति (नीला)। होली = जीवन के सभी रंगों को स्वीकार करना।
  4. 4बुराई पर अच्छाई: रात = होलिका दहन (बुराई जली)। दिन = रंग (अच्छाई का उत्सव)। अंधकार के बाद प्रकाश = विविध रंग।
  5. 5वसंत ऊर्जा: वसंत = प्रकृति में नये रंग (फूल, पत्ते)। होली = प्रकृति के रंगों का उत्सव = प्रकृति से एकत्व।
  6. 6क्षमा और नवीनता: रंग = पुराने मनभेद मिटाकर नये सम्बंध। 'बुरा न मानो होली है' = क्षमा + नवीन आरम्भ।
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