वर्ण = गुण-कर्म आधारित (गीता 4.13), 4 वर्ण, परिवर्तनीय। जाति = जन्म आधारित, हजारों उप-जातियाँ, अपरिवर्तनीय। जाति व्यवस्था वर्ण की विकृति है। गीता: 'चातुर्वर्ण्यं गुणकर्मविभागशः' — जन्म से नहीं, गुण-कर्म से।
- 1वैदिक/शास्त्रीय अवधारणा — गीता (4.13):
- 2चार वर्ण:
- 3गुण-कर्म आधारित — व्यक्ति का वर्ण उसके गुणों और कर्मों से निर्धारित होता है, जन्म से नहीं।
- 4परिवर्तनीय — गुण बदलने से वर्ण बदल सकता है (शास्त्रों में उदाहरण: विश्वामित्र क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने, वाल्मीकि निम्न कुल से महर्षि बने, वेदव्यास मछुआरिन सत्यवती के पुत्र थे)।
- 5सामाजिक/ऐतिहासिक विकास — समय के साथ वर्ण व्यवस्था विकृत होकर जाति व्यवस्था में बदल गई।
- 6जन्म आधारित — जाति जन्म से निर्धारित, परिवर्तन संभव नहीं।
- 7हजारों उप-जातियाँ — चार वर्ण सैकड़ों-हजारों जातियों-उपजातियों में बँट गए।
- 8भेदभाव और शोषण — ऊँच-नीच, छुआछूत जैसी कुरीतियाँ जन्म-आधारित जाति व्यवस्था की उपज हैं, वैदिक वर्ण व्यवस्था की नहीं।