कल्पतरु ग्रंथ में श्राद्ध को क्या कहा गया है?
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कल्पतरु: 'पितरों के लाभ के लिए यज्ञिय वस्तुओं का त्याग + सुपात्र ब्राह्मणों द्वारा उसका ग्रहण = प्रधान श्राद्ध कर्म।' दोनों अंग आवश्यक — केवल त्याग अधूरा है।
- 1पितरों के लाभ के लिए शुद्ध, यज्ञ-योग्य पवित्र वस्तुओं का त्याग करना।
- 2अर्थात् श्राद्ध 'त्याग' का कर्म है।
- 3त्यागी गई वस्तुओं को योग्य, श्रेष्ठ ब्राह्मण ग्रहण करें।
- 4सुपात्र ब्राह्मण = वेद-शास्त्र के ज्ञाता, सदाचारी।
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श्राद्ध परिचय
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