का सरल उत्तर
कल्पतरु: 'पितरों के लाभ के लिए यज्ञिय वस्तुओं का त्याग + सुपात्र ब्राह्मणों द्वारा उसका ग्रहण = प्रधान श्राद्ध कर्म।' दोनों अंग आवश्यक — केवल त्याग अधूरा है।
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
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