कर्मानुसार आत्मा पांच गतियों को प्राप्त होती है: देवयान (ब्रह्मलोक/मोक्ष), पितृयान (पितृलोक → पुनर्जन्म), मनुष्य/पशु योनि में पुनर्जन्म, नरक (पापियों को), या सीधे मोक्ष। गीता 8.6 — अंतिम क्षण का भाव गति निर्धारित करता है।
- 1देवयान मार्ग (उत्तरायण/शुक्ल मार्ग) — ज्ञानी और उपासक आत्माएं इस मार्ग से ब्रह्मलोक जाती हैं और वहां से मोक्ष प्राप्त करती हैं। बृहदारण्यक उपनिषद (6.2.15) में इसे अग्नि → दिन → शुक्ल पक्ष → उत्तरायण → सूर्य → चंद्र → विद्युत मार्ग बताया गया है।
- 2पितृयान मार्ग (दक्षिणायन/कृष्ण मार्ग) — सकाम कर्म करने वाले इस मार्ग से चंद्रलोक/पितृलोक जाते हैं, पुण्य क्षीण होने पर पुनः जन्म लेते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद (6.2.16) में वर्णित।
- 3तृतीय गति (पुनर्जन्म) — सामान्य जीव कर्मानुसार पुनः मनुष्य, पशु या अन्य योनि में जन्म लेते हैं।
- 4चतुर्थ गति (अधोगति) — अत्यंत पापी आत्माएं नरक या निम्न योनियों (कीट, पतंग आदि) में जाती हैं। गरुड़ पुराण में इसका विस्तृत वर्णन है।
- 5मोक्ष — पूर्ण ज्ञानी या परम भक्त सीधे मोक्ष प्राप्त करते हैं — जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति।