मंदिर में अन्नदान करने का शास्त्रीय विधान क्या है?
की चेकलिस्ट
अन्नदान = सर्वश्रेष्ठ दान ('अन्नदानं परं दानम्')। अन्न = ब्रह्म (उपनिषद)। विधि: संकल्प → शुद्ध सात्विक भोजन → भूखे/निर्धन/मंदिर रसोई को। श्रद्धा-सम्मान से, बासी नहीं। प्रतिदिन सर्वोत्तम। भंडारा सेवा = श्रम-दान। गीता: अन्नदान न करना = 'चोरी'।
- 1शुद्ध सात्विक भोजन (प्याज-लहसुन-मांस रहित)
- 2चावल, दाल, रोटी, सब्जी, मिठाई, फल
- 3अनाज (कच्चा) — गेहूँ, चावल, दाल का दान भी उत्तम
- 4भूखे और निर्धन को (सर्वश्रेष्ठ)
- 5ब्राह्मण/पुरोहित को
- 6मंदिर की रसोई/भंडारा में
- 7अन्नक्षेत्र (Free Kitchen) चलाने वाली संस्थाओं को
- 8प्रतिदिन (सर्वोत्तम — 'अतिथि देवो भव')
- 9एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा — विशेष
- 10श्राद्ध पक्ष — पितर तृप्ति
- 11त्योहारों पर भंडारा
- 12ग्रहण काल के बाद
- 13अन्नदान श्रद्धा और सम्मान से करें — दया या अहंकार से नहीं
- 14भोजन स्वच्छ और ताज़ा हो — बासी/सड़ा नहीं
- 15खाने वाले का अपमान न करें
- 16'इदं न मम' (यह मेरा नहीं) भाव से — समर्पण
- 17इस लोक में सुख-समृद्धि
- 18परलोक में उत्तम गति
- 19पितरों की तृप्ति (श्राद्ध में)
- 20सभी पापों का नाश
- 21जो अन्नदान नहीं करता वह 'चोर' के समान (गीता 3.12)
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मंदिर दान
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