मंदिर में पूजा के दौरान ध्यान क्यों जरूरी है?
की चेकलिस्ट
गीता (17.11): मन एकाग्र करके की गई पूजा सात्विक। गीता (3.6): शरीर पूजा करे और मन भटके — वह मिथ्याचार। बिना ध्यान के पूजा = शरीर का व्यायाम, आत्मा का पोषण नहीं। ध्यान पूजा को यांत्रिक क्रिया से जीवंत साधना में बदलता है।
- 1जो पूजा विधिपूर्वक, फल की इच्छा छोड़कर, मन को एकाग्र (समाधाय) करके की जाए — वह सात्विक है। और:
- 2जो पूजा दिखावे के लिए और मन बिखरे हुए हो — वह राजसिक (निम्न) है।
- 3जो बाह्य रूप से क्रिया करे और मन इंद्रिय-विषयों में भटके — वह 'मिथ्याचारी' है। अर्थात् शरीर पूजा करे और मन बाजार में हो — यह पूजा नहीं।
- 4पूजा का अंतिम लक्ष्य यही है — मन और बुद्धि भगवान में स्थिर हों। यह ध्यान के बिना असंभव है।
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मंदिर पूजा
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