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मंत्र जप में अग्निहोत्र का क्या महत्व है?

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मंत्र + अग्नि = शक्ति गुणित। पुरश्चरण: दशांश हवन अनिवार्य। ऋग्वेद: 'अग्नि = देवताओं का मुख' — हवन = देवताओं तक मंत्र पहुंचाना। वातावरण शुद्धि। दीपक (घी) = लघु अग्निहोत्र।

  1. 1मंत्र + अग्नि = शक्ति गुणित: मंत्र की ध्वनि ऊर्जा अग्नि के माध्यम से ब्रह्मांड में प्रसारित होती है।
  2. 2पुरश्चरण: सवा लाख जप → दशांश (12,500) हवन आहुतियां → मंत्र सिद्ध।
  3. 3ऋग्वेद: 'अग्निर्मुखं प्रथमो देवतानाम्' — अग्नि देवताओं का मुख। हवन = देवताओं तक मंत्र पहुंचाने का माध्यम।
  4. 4वातावरण शुद्धि: हवन = वायु शुद्धि, नकारात्मक ऊर्जा नाश।
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