विस्तृत उत्तर
अग्निहोत्र (हवन/यज्ञ) = मंत्र जप का शक्तिवर्धक अंग। पुरश्चरण विधि में दशांश हवन अनिवार्य है।
महत्व
- 1मंत्र + अग्नि = शक्ति गुणित: मंत्र की ध्वनि ऊर्जा अग्नि के माध्यम से ब्रह्मांड में प्रसारित होती है।
- 2पुरश्चरण: सवा लाख जप → दशांश (12,500) हवन आहुतियां → मंत्र सिद्ध।
- 3ऋग्वेद: 'अग्निर्मुखं प्रथमो देवतानाम्' — अग्नि देवताओं का मुख। हवन = देवताओं तक मंत्र पहुंचाने का माध्यम।
- 4वातावरण शुद्धि: हवन = वायु शुद्धि, नकारात्मक ऊर्जा नाश।
व्यावहारिक: गृह प्रवेश, नवरात्रि, अनुष्ठान पूर्ण होने पर हवन। घी + तिल + हवन सामग्री + मंत्र = आहुति।
सामान्य भक्त: प्रतिदिन हवन संभव न हो तो दीपक (घी) = लघु अग्निहोत्र। मंत्र जप के साथ दीपक अवश्य जलाएं।





