गुरु = सबसे महत्वपूर्ण। पहचान: शास्त्र+अनुभव, निःस्वार्थ, परंपरा, शुद्ध आचरण। कैसे: दीक्षा, नियमित संपर्क, प्रश्न, आज्ञा पालन, सेवा। न मिले: सद्ग्रंथ=गुरु, नाम जप, ईश्वर से प्रार्थना।
- 1शास्त्र ज्ञान + अनुभव — केवल पुस्तकी नहीं, स्वयं साधक।
- 2निःस्वार्थ — धन/प्रसिद्धि की लालसा नहीं।
- 3शिष्य का कल्याण — शिष्य की प्रकृति/स्तर देखकर मंत्र और मार्गदर्शन दें।
- 4परंपरा — किसी प्रामाणिक गुरु परंपरा (संप्रदाय) से जुड़े हों।
- 5आचरण शुद्ध — 'आचार्यवान् पुरुषो वेद' (छांदोग्य उपनिषद)।
- 6दीक्षा: गुरु से इष्ट मंत्र प्राप्त करें।
- 7नियमित संपर्क: साधना अनुभव गुरु को बताएं — सही/गलत बताएंगे।
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