कारण: (1) शक्ति संरक्षण (बीज = अंकुरण तक छुपाएं)। (2) अहंकार बचाव (प्रदर्शन = शत्रु)। (3) दृष्टि दोष। (4) गुरु आज्ञा। अथर्वशीर्ष: 'अशिष्य को न दें, मोह से देना = पाप।' गोपनीय: दीक्षा मंत्र, संख्या, अनुभव। साझा: सार्वजनिक मंत्र (राम, गायत्री)।
- 1मंत्र शक्ति का संरक्षण: जैसे बीज को अंकुरण तक मिट्टी में छुपाकर रखते हैं — वैसे ही मंत्र शक्ति को सिद्धि तक गोपनीय रखना आवश्यक। बताने से शक्ति बिखर जाती है।
- 2अहंकार से बचाव: 'मैं इतने जप कर रहा हूं', 'मुझे सिद्धि मिल रही है' — यह प्रदर्शन अहंकार बढ़ाता है। अहंकार = साधना का सबसे बड़ा शत्रु।
- 3दृष्टि दोष (नजर): दूसरों की ईर्ष्या/नकारात्मक ऊर्जा साधना को प्रभावित कर सकती है।
- 4गुरु आज्ञा: गुरु दीक्षा मंत्र स्वभावतः गोपनीय होता है — 'गुह्यं' (गोपनीय) शब्द मंत्रों के लिए बार-बार प्रयुक्त।
- 5गणपति अथर्वशीर्ष (श्लोक 13): 'इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्' — अशिष्य को न दें। 'यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति' — मोह से देने वाला पापी।