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नवरात्रि में कलश स्थापना कब और कैसे करें?

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कलश स्थापना: प्रतिपदा, शुभ मुहूर्त (भद्रा वर्जित)। विधि: जौ बोएँ → तांबे कलश में गंगाजल + सप्तमृत्तिका + पंचरत्न → स्वस्तिक-मौली → आम पत्ते + नारियल → 'ॐ आ जिघ्र कलशं...' मंत्र → देवी आवाहन → अखण्ड ज्योति। 9 दिन अचल रहे।

  1. 1स्थान शुद्धि: पूजा स्थल साफ करें, गंगाजल छिड़कें। लकड़ी की चौकी पर लाल/सफेद कपड़ा बिछाएँ।
  2. 2जौ बोना: मिट्टी के चौड़े पात्र में मिट्टी डालकर जौ (जवारे) बोएँ। इस पात्र को चौकी पर रखें। (नवमी तक जवारे उगते हैं — शुभता का प्रतीक।)
  3. 3कलश तैयारी: तांबे या मिट्टी के कलश में गंगाजल भरें। कलश में सप्तमृत्तिका (सात प्रकार की मिट्टी), पंचरत्न, सर्वौषधि, अक्षत, फूल, दूर्वा, कुमकुम, साबूत हल्दी, सुपारी, सिक्का डालें।
  4. 4कलश सज्जा: कलश पर स्वस्तिक बनाएँ, मौली (कलावा) लपेटें, कुमकुम तिलक। कलश के ऊपर आम के 5 पत्ते रखें, उन पर नारियल (जटा सहित) स्थापित करें।
  5. 5स्थापना मंत्र: 'ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशतादयिः।'
  6. 6देवी आवाहन: 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' या 'या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।'
  7. 7ज्योति प्रज्वलन: अखण्ड ज्योति (9 दिन) या नित्य दीपक जलाएँ।
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