गीता (4.36): ज्ञान की अग्नि सभी कर्मों को भस्म करती है। गीता (18.66): शरणागति। कर्मयोग: निष्काम अच्छे कर्म। प्रायश्चित: तप, दान, तीर्थ, जप। सबसे महत्वपूर्ण — वर्तमान कर्म (क्रियमाण) पर ध्यान दो, भविष्य सुधरेगा।
- 1ज्ञान की अग्नि सभी कर्मों (पूर्व जन्म के सहित) को भस्म कर देती है। आत्मज्ञान सबसे शक्तिशाली पाप नाशक।
- 2अनन्य भक्ति से दुराचारी भी शुद्ध होता है।
- 3ईश्वर शरणागति से सभी पापों से मुक्ति का वचन।
- 4वर्तमान में बिना फल की इच्छा अच्छे कर्म करना — इससे नया शुभ कर्म संचित होता है जो पुराने पापों को निष्प्रभावी करता है।
- 5तप — उपवास, व्रत, कठोर आचरण।
- 6दान — यथाशक्ति अन्न, वस्त्र, धन दान।
- 7तीर्थ यात्रा — गंगा स्नान, प्रयाग, काशी, रामेश्वरम आदि।
- 8जप — गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, विष्णु सहस्रनाम।
- 9तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान (क्रियायोग) से क्लेश (पापों के बीज) क्षीण होते हैं।
- 10पूर्व जन्म के सभी कर्म मिटाना आवश्यक नहीं — वर्तमान कर्म (क्रियमाण) पर ध्यान दो। वर्तमान के अच्छे कर्म भविष्य का प्रारब्ध सुधारते हैं।
- 11गीता का मूल संदेश: पुरुषार्थ करो, भाग्य बदलेगा।