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संध्या वंदन छोड़ने का क्या पाप लगता है शास्त्रों में?

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संध्या छोड़ना: मनुस्मृति — 'शूद्रवत्' (कर्तव्यच्युत)। 3 दिन छोड़ने = 'पतित।' नित्य कर्म = प्राणवत्। व्यावहारिक: न कर सकें = गायत्री 108 जप/दिन। सरल संध्या = स्नान+आचमन+गायत्री+सूर्य अर्घ्य (10-15 मिनट)।

  1. 1मनुस्मृति (2.103): 'अनामयं प्रातरुपास्य सायमुपास्य च। अनामयो भवत्येष तमस्य नश्यति।' — प्रातः-सायं संध्या करने वाला रोगमुक्त और पापमुक्त रहता है।
  2. 2मनुस्मृति (2.104): 'यो नास्ति कुर्यात् त्रिषवणं संध्यामुपास्ते सदा। स शूद्रवदधर्मी स्यात्...' — जो तीनों संध्या नहीं करता, वह शूद्रवत् (कर्तव्यच्युत) माना जाता है।
  3. 3गौतम धर्मसूत्र: संध्या वंदन = 'न त्याज्यम्' (कभी न छोड़ा जाने वाला)। इसे 'प्राणवत्' (प्राण के समान) महत्वपूर्ण कहा।
  4. 4पातित्य भय: कुछ स्मृतिकारों ने लगातार 3 दिन संध्या छोड़ने पर 'पतित' (कर्तव्यच्युत) और पुनः गायत्री उपदेश लेने का विधान बताया।
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वैदिक कर्मकांड

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