विस्तृत उत्तर
संध्या वंदन उपनयन संस्कार (जनेऊ) प्राप्त द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) का नित्य कर्तव्य (नित्य कर्म) है। इसे छोड़ने पर शास्त्रों में कठोर निन्दा की गई है:
शास्त्रीय वचन
- 1मनुस्मृति (2.103): 'अनामयं प्रातरुपास्य सायमुपास्य च। अनामयो भवत्येष तमस्य नश्यति।' — प्रातः-सायं संध्या करने वाला रोगमुक्त और पापमुक्त रहता है।
- 1मनुस्मृति (2.104): 'यो नास्ति कुर्यात् त्रिषवणं संध्यामुपास्ते सदा। स शूद्रवदधर्मी स्यात्...' — जो तीनों संध्या नहीं करता, वह शूद्रवत् (कर्तव्यच्युत) माना जाता है।
- 1गौतम धर्मसूत्र: संध्या वंदन = 'न त्याज्यम्' (कभी न छोड़ा जाने वाला)। इसे 'प्राणवत्' (प्राण के समान) महत्वपूर्ण कहा।
- 1पातित्य भय: कुछ स्मृतिकारों ने लगातार 3 दिन संध्या छोड़ने पर 'पतित' (कर्तव्यच्युत) और पुनः गायत्री उपदेश लेने का विधान बताया।
व्यावहारिक दृष्टिकोण
- ▸ये प्रायश्चित विधान उस काल के लिए हैं जब वैदिक कर्मकांड दैनिक जीवन का अभिन्न अंग था।
- ▸आज यदि कोई श्रद्धापूर्वक संध्या वंदन नहीं कर पाता, तो गायत्री मंत्र का कम से कम 108 बार जप प्रतिदिन करें — यह सरलतम संध्या है।
- ▸भगवान भक्ति भाव देखते हैं, कठोर दण्ड नहीं देते। किन्तु शास्त्र = मार्गदर्शन — नित्य कर्म का पालन यथासम्भव करें।
संध्या वंदन = सरल रूप: स्नान → आचमन → प्राणायाम → गायत्री जप (108/28/10 बार) → सूर्य अर्घ्य = सरलतम संध्या। 10-15 मिनट में सम्भव।





