विस्तृत उत्तर
उपनयन (जनेऊ) संस्कार = 'द्विजन्म' (दूसरा जन्म)। इसके बाद बालक 'ब्रह्मचारी' कहलाता है और विशेष नियमों का पालन करता है:
अनिवार्य नियम
- 1त्रिसंध्या वंदन: प्रातः, मध्याह्न, सायं — तीनों संध्या वंदन (गायत्री जप + सूर्य अर्घ्य) नित्य कर्तव्य।
- 1ब्रह्मचर्य: ब्रह्मचर्य (शारीरिक + मानसिक) पालन। विवाह तक।
- 1गुरु सेवा: गुरु (आचार्य) की सेवा, आज्ञा पालन। वैदिक काल = गुरुकुल में निवास।
- 1अध्ययन: वेद, शास्त्र, विद्या का नियमित अध्ययन। 'स्वाध्यायान्मा प्रमदः' (तैत्तिरीय उपनिषद)।
- 1समिधादान: प्रतिदिन अग्नि में समिधा (लकड़ी) की आहुति = अग्निहोत्र का सरल रूप।
- 1भिक्षाचर्या: ब्रह्मचारी भिक्षा माँगकर भोजन करे = अहंकार नाश, विनम्रता। वर्तमान में = सात्त्विक भोजन।
- 1सात्त्विक आहार: मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन वर्जित। शुद्ध, सात्त्विक भोजन।
- 1जनेऊ नियम: जनेऊ सदा धारण रखें — स्नान, शौच, भोजन में विशेष नियम (शौच में कान पर चढ़ाएँ)।
वर्तमान में: सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य नियम पालन कठिन। न्यूनतम = नित्य गायत्री जप (108 बार), जनेऊ धारण, सात्त्विक जीवन, अध्ययन निष्ठा।





