विस्तृत उत्तर
गायत्री मंत्र — सर्व मंत्राणां जननी — की सिद्धि का विधान शास्त्रों में विस्तार से वर्णित है:
गायत्री मंत्र (ऋग्वेद 3.62.10)
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।
— अर्थ: उस सविता देव के वरेण्य तेज का हम ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।
गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं — इसीलिए पुरश्चरण = 24 लाख जप।
सिद्धि की सम्पूर्ण विधि (मंत्रमहार्णव + देवीभागवत)
1अधिकारी (पात्रता)
मनुस्मृति (2.78): यज्ञोपवीत-संस्कार के बाद द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) को गायत्री का अधिकार। परंतु देवीभागवत के अनुसार गायत्री उपासना सभी के लिए सुलभ है। विवाद की स्थिति में गुरु का मार्गदर्शन लें।
2दीक्षा
सूर्योपासना-दीक्षा या गायत्री-दीक्षा गुरु से लें।
3पुरश्चरण विधि
- ▸संख्या: 24 लाख जप (24 अक्षर × 1 लाख)
- ▸नित्य जप: 1000 से 10,000 तक — साधक की क्षमता अनुसार
- ▸काल: ब्रह्ममुहूर्त (4-6 बजे) — सर्वोत्तम। सूर्योदय और मध्याह्न-संध्या भी उपयुक्त।
- ▸तीन संध्याएं: प्रातः, मध्याह्न, सायं — तीनों में जप करना 'त्रिसंध्या उपासना' कहलाती है।
4सहायक क्रियाएं
- ▸हवन: जप का 10वाँ भाग — 2.4 लाख आहुति — तिल, जौ, घी के साथ
- ▸तर्पण: हवन का 10वाँ
- ▸मार्जन: तर्पण का 10वाँ
- ▸ब्राह्मण भोजन: मार्जन का 10वाँ
5साधना नियम
- ▸सूर्य की ओर मुख करके बैठें
- ▸लाल या पीले वस्त्र धारण करें
- ▸स्फटिक माला (सर्वोत्तम), रुद्राक्ष, या तुलसी माला उपयोग करें
- ▸सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य
6ध्यान-रूप (देवीभागवत)
गायत्री देवी का स्वरूप — लाल वस्त्र, हंसवाहिनी, अक्षमाला, कमंडलु, अभय और वरद मुद्रा में — ध्यान करें।
सिद्धि के संकेत
जप के दौरान तीव्र प्रकाश-अनुभव, बुद्धि में असाधारण स्पष्टता, और स्वप्न में गायत्री देवी का दर्शन।





