विस्तृत उत्तर
महामृत्युंजय मंत्र — मृत्यु और रोग पर विजय का महामंत्र — की सिद्धि:
महामृत्युंजय मंत्र (यजुर्वेद 3.60)
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।'
— अर्थ: हम त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले शिव) की पूजा करते हैं जो सुगंधित और पोषणकर्ता हैं। हमें ककड़ी की भांति मृत्यु के बंधन से मुक्त करें — अमृत से नहीं।
मंत्र में 33 अक्षर → पुरश्चरण = 33 लाख जप।
सिद्धि की सम्पूर्ण विधि (शिव पुराण + मंत्रमहार्णव)
1उचित काल
- ▸सोमवार — महामृत्युंजय जप के लिए विशेष (शिव-वार)
- ▸ब्रह्ममुहूर्त — सर्वोत्तम
- ▸महाशिवरात्रि — वर्ष में एक बार — इस दिन जप का फल अनंत
- ▸सूर्यग्रहण/चंद्रग्रहण — अत्यंत शक्तिशाली
2सामग्री
- ▸माला: रुद्राक्ष माला — अनिवार्य। महामृत्युंजय में रुद्राक्ष ही मान्य।
- ▸वस्त्र: सफेद या भस्म-वर्ण
- ▸आसन: कुशासन या ऊनी
- ▸दिशा: उत्तर या पूर्व मुख
3ध्यान-रूप (शिव पुराण)
त्र्यम्बक शिव — तीन नेत्र, चंद्रमौलि, जटाजूट, श्वेत वर्ण, शूल-डमरू-वरद-अभयमुद्रा — का ध्यान करें।
4जप-विधि
- ▸प्रत्येक माला के साथ: 'ॐ त्र्यम्बकं...' पूर्ण मंत्र का स्पष्ट उच्चारण
- ▸'मृत्योर्मुक्षीय' — यहाँ भाव करें कि मृत्यु-भय, रोग, और संकट दूर हो रहे हैं
- ▸'माऽमृतात्' — मृत्यु से नहीं, अमृत (मोक्ष) से मुक्त न हो — यह नकारात्मक प्रार्थना नहीं, अपितु 'अमृत में बना रहने' का भाव है
5हवन सामग्री
रुद्रयामल: तिल, जौ, दूर्वा, और घी — प्रत्येक आहुति के साथ 'स्वाहा' जोड़कर हवन।
6विशेष उपयोग
- ▸गंभीर रोगी के लिए: परिवार के सदस्य रोगी की ओर से जप करें
- ▸दुर्घटना-भय: 11 माला नित्य
- ▸अकाल मृत्यु-योग में: 1.25 लाख जप एक अनुष्ठान में
सिद्धि के संकेत
जप के दौरान शरीर में उष्णता, रोग में असाधारण सुधार, और स्वप्न में नीलकंठ शिव का दर्शन।





