तीर्थ यात्रा = तप + पवित्र जल + संत संग + मन शुद्धि। प्रमुख: प्रयागराज (संगम), काशी, गया (पितृ तर्पण), रामेश्वरम, चार धाम। शर्त: श्रद्धा + पश्चाताप + सदाचार। बिना भक्ति भाव तीर्थ व्यर्थ (कबीर)।
- 1तप का स्वरूप — तीर्थ यात्रा शारीरिक कष्ट सहकर की जाती है (पैदल चलना, कठिन मार्ग) — यह तप का रूप है।
- 2पवित्र जल — गंगा, यमुना, नर्मदा आदि पवित्र नदियों का जल शुद्धिकारक माना जाता है। स्कंद पुराण में गंगा को 'पापनाशिनी' कहा गया।
- 3संत संग — तीर्थों पर साधु-संतों का सत्संग मिलता है जो मन शुद्ध करता है।
- 4मन की शुद्धि — तीर्थ यात्रा का वास्तविक प्रभाव मन पर होता है — श्रद्धा, पश्चाताप और वैराग्य भाव जागता है।