उपनयन संस्कार यज्ञोपवीत कैसे होता है?
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उपनयन = गुरु के निकट ले जाना। ब्राह्मण 8, क्षत्रिय 11, वैश्य 12 वर्ष। विधि: मुंडन → हवन → तीन सूत्र जनेऊ धारण → गायत्री दीक्षा → दण्ड धारण → भिक्षा चर्या। तीन लड़ = गायत्री त्रिपदा। गृहस्थ छह सूत्र। यज्ञोपवीत आजीवन।
- 1पूर्व तैयारी: शुभ मुहूर्त निर्धारण (उत्तरायण सूर्य, शुभ नक्षत्र)। संस्कार से एक दिन पूर्व बालक को केवल दूध पीना चाहिए। पिता या उपनयनकर्ता गायत्री मंत्र का 12 सहस्र जाप का संकल्प लेता है।
- 2मुंडन: परम्परानुसार बालक का मुंडन कराया जाता है, जो शृंगारिकता के प्रति उदासीनता का प्रतीक है।
- 3गृहयज्ञ: गणपति, सरस्वती, लक्ष्मी आदि का आह्वान और स्तुति के साथ हवन किया जाता है।
- 4यज्ञोपवीत धारण: तीन सूत्रों का जनेऊ (यज्ञोपवीत) बालक को धारण कराया जाता है। तीन लड़ें गायत्री मंत्र के तीन चरणों (त्रिपदा) का प्रतीक हैं। प्रत्येक लड़ में तीन धागे होते हैं। तीन गाँठें भूः, भुवः, स्वः व्याहृतियों का प्रतीक हैं।
- 5गायत्री उपदेश: आचार्य बालक को गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हैं। यह संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण अंग है।
- 6मेखला और दण्ड धारण: बालक को मौंजी (मेखला) बाँधी जाती है और दण्ड (डण्डा) दिया जाता है। दण्ड ज्ञान के कठिन मार्ग पर चलने का प्रतीक है।
- 7भिक्षा चर्या: बालक परिजनों से भिक्षा माँगता है, जो विनम्रता और अहंकार नाश का प्रतीक है।
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