उपनिषद में गुरु का महत्व क्या है?
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उपनिषदों में गुरु अनिवार्य है। मुण्डकोपनिषद (1/2/12) में श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाने का आदेश है। छान्दोग्य (6/14/2) में गुरु 'अंधे को मार्ग दिखाने वाला' है। श्वेताश्वतर (6/23) — ईश्वर और गुरु में समान भक्ति से ही उपनिषद-ज्ञान प्रकट होता है।
- 1ब्रह्म-ज्ञान के लिए हाथ में समिधा लेकर ऐसे गुरु के पास जाओ जो:
- 2जैसे अंधे व्यक्ति को किसी ने गांधार से दूर जंगल में छोड़ दिया — वह बिना मार्गदर्शक के न जा सकता। गुरु वह मार्गदर्शक है जो शिष्य को भटकाव से निकालकर 'गांधार' (मुक्ति) तक पहुँचाता है।
- 3श्रेय (कल्याण) और प्रेय (सुख) दोनों मनुष्य के सामने आते हैं। जो श्रेय को चुनता है, वही गुरु की ओर जाता है। सच्चा गुरु दुर्लभ है और सच्चा शिष्य भी।
- 4जिसकी परमात्मा में जैसी भक्ति है, वैसी ही गुरु में हो — उसके लिए ही ये उपनिषद-वाक्य प्रकाशित होते हैं।
- 5आचार्य साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप है।
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