उपनिषद में गुरु-शिष्य परंपरा क्या है?
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उपनिषद स्वयं गुरु-शिष्य संवाद हैं — यमराज-नचिकेता, उद्दालक-श्वेतकेतु, याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी। गुरु — श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिए (मुण्डकोपनिषद 1/2/12)। शिष्य — श्रद्धा, जिज्ञासा और ब्रह्मचर्य से युक्त। ज्ञान श्रवण-मनन-निदिध्यासन से मिलता है।
- 1कठोपनिषद — यमराज और नचिकेता
- 2छान्दोग्य — आरुणि (उद्दालक) और श्वेतकेतु
- 3मुण्डकोपनिषद — अंगिरा और शौनक
- 4बृहदारण्यक — याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी-गार्गी
- 5श्रद्धा (गुरु और शास्त्र में विश्वास)
- 6जिज्ञासा (ज्ञान की तीव्र इच्छा)
- 7विनम्रता और सेवाभाव
- 8ब्रह्मचर्य का पालन
- 9श्रोत्रिय — वेदों का पारंगत विद्वान
- 10ब्रह्मनिष्ठ — स्वयं ब्रह्म में स्थित, अनुभवी
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